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Sunday, October 26, 2014


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शोकेस - सामूहिक कलाकार
कलकत्ता ग्रुप
सन् 1943 में पूर्व कलकत्ता भी बंगाल को बरबाद करने वाले अकाल का असर पड़ा। कहते हैं कि लाखों को लीलने वाले इस अकाल के पीछे तत्कालीन ब्रिटिश शासन की गलत नीतियों का हाथ रहा। यह एक अभूतपूर्व तबाही थी जिसने कई कलाकारों को अपनी चित्र भाषा को नए नजरिये से देखने को मजबूर कर दिया।

युवा कलाकारों के समूह ने पूर्व के बंगाली कलाकारों के कार्य में व्याप्त लय और प्रणय को अस्वीकार करने का मन बना लिया। उनमें 6 ने कलकत्ता ग्रुप बनाया। संस्थापक सदस्यों में शामिल थे प्रदोष दासगुप्ता, उनकी पत्नी कमला, चित्रकार गोपाल घोष, नीरद मजूमदार, परितोष सेन, और सुभो टैगोर। प्राण कृष्ण लाल, गोवर्द्धन आश और बंसी चंद्रगुप्त जैसे कलाकार कालांतर में जुटते चले गए।

कलाकारों के इस समूह ने शहरी समाज के संकट को प्रतिविम्बित करने की दृश्य भाषा की आवश्यकता को रेखांकित कर दिया। आधुनिक भारतीय कला में पहली बार कलाकारों की रचनाओं में डर और अंदेशा व्यक्त होने लगे, शहरी परिस्थिति के प्रतिबिम्ब दिखे। ग्रामीण परिदृश्य विशुद्ध शांत नहीं रहे। साथ ही, चित्रकला की औपचारिक शिक्षा में यूरोप की आधुनिकता साफ झलकने लगी।

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप, मुंबई
1947 आते-आते मुंबई के कलाकारों में बेचैनी की लहर उठने लगी। परिणामस्वरूप प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (पीएजी) की स्थापना हुई। इसमें फ्रांसिस न्यूटन सुज़ा, मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रज़ा, कृष्ण हवालाजी अरा, हरि अंबा दास गडे और मूर्तिकार एस. वर्के शामिल थे। संस्थापक सदस्यों के अलावा सौंदर्य़ मूल्यों को लेकर अन्य कलाकार में भी दृश्य भाषा के प्रति इस समूह की भावना की ओर रुझान देखा गया। विशुद्ध स्वरूप के प्रति लगाव उनकी आस्था बन गई। पीएजी से निकटता रखने वाले मशहूर कलाकारों में उल्लेखनीय हैं अकबर पदमसी, तैयब मेहता, बाल छाबड़ा, वासुदेव एस गायतोंडे, राम कुमार और कृष्ण खन्ना। एनजीएमए में इन कलाकारों में अधिकांश द्वारा बनाए गए की चित्र है जो उनकी कलात्मक विकास के विभिन्न चरणों को प्रस्तुत करते हैं। इस काल के अन्य कलाकार जिन्होंने इसी दिशा में बढ़ने की ठान ली वे हैं नारायण श्रीधर बेंद्रे और कटिंगेरी कृष्ण हेब्बर।

यंग तुर्क
कलकत्ता ग्रुप के अतिरिक्त यंग तुर्क नामक एक अन्य समूह था। पी.टी. रेड्डी इसके प्रमुख सदस्य थे। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट के प्रिंसिपल चार्ल्स जेरारर्ड से प्रोत्साहन पा कर यंग तुर्क ने 1941 में अपनी पहली प्रदर्शनी लगाई। इसके बाद भवेश सान्याल और सैलोज़ मुखर्जी ने कलकत्ता को अलविदा कह दिया। भवेश लाहौर चले गए तो सैलोज रोजगार की तलाश में दिल्ली आए। एनजीएमए संग्रह में इन्हें खास स्थान प्राप्त है।
 

एच ए गेड

हाउसेज, कागज पर डिस्टेम्पर, 66.5 X51.5 सेमी

एन एस बेन्द्रे

द थॉर्न, बोर्ड पर ऑयल, 119.3 X168 सेमी

सतीश गुजराल

डिस्पेयर, हार्डबोर्ड पर ऑयल, 91 X91 सेमी

राम कुमार

टाइन, कैनवास पर ऑयल, 119 X 99 सेमी

परितोश सेन

सिएस्टा, ऑयल, 121.3 X90.5 सेमी

केके हेब्बर

मैरेज सेरेमनी, कैनवास पर ऑयल, 74.9 X 100.5 सेमी

सैलोज़ मुखर्जी

मदर एण्ड चाइल्ड ऑयल, 66 X67 सेमी

अकबर पदमसी

ऑरेंज न्यूड, बोर्ड पर ऑयल 71.9 X71.2 सेमी

गोपाल घोष

विलेज नियर मसूरी, कागज पर डिस्टेम्पर, 60 X 49 सेमी

निरोद मजूमदार

नेताज़ घाट, कैनवास पर ऑयल, 88 X 116.5 सेमी

पीटी रेड्डी

बर्ड, कैनवास पर ऑयल,89.5 X 115.5 सेमी

कृष्ण खन्ना

ब्लैक ट्रक, कैनवास पर ऑयल, 171 X 122सेमी

तयूब मेहता

फॉलिंग फिगर, कैनवास पर ऑयल,77X104 सेमी

एफ एन सौज़ा

विपिंग कंग कैनवास पर ऑयल, 50 X 80.5 सेमी

भबेष सन्याल

ओल्ड मैन एण्ड द बर्द, कैनवास पर ऑयल,129.6 X 129 सेमी

के एच आरा

स्टिल लाइफ, कागज पर ऑयल, 74 X 109 सेमी

एमएफ हुसैन

मदर टेरेसा, कैनवास पर ऑयल, 233X128 सेमी

 

लघुचित्र

तंजाउर एवं मैसूर

यूरोपियन पर्यटक कलाकार

कम्पनी काल

कालीघाट पेंटिंग

सैद्धान्तिक यथार्थवाद

बंगाल स्कूल

अमृता शेर-गिल

यामिनी राय

गगनेंद्रनाथ टैगोर

रवीन्द्रनाथ टैगोर

शांतिनिकेतन

सामूहिक कलाकार

भावप्रधान कला

1960 का कला आंदोलन

1970 का कला आंदोलन

समकालीन

आधुनिक मूर्तिकला

मुद्रण करना

फोटोग्राफी