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एनजीएमए मुंबई  |  एनजीएमए बंगलुरू

Wednesday, April 23, 2014


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इतिहास
राष्ट्रीय कला संग्रहालय बनाने का विचार पहली बार सन् 1949 में अंकुरित और प्रस्फुटित हुआ। इस विचार को सींचने का श्रेय प्रथम प्रधान मंत्री स्वयं पं. नेहरू और मौलाना आजाद के साथ-साथ हुमायूं कबीर जैसे संवेदनशील अफसरशाह को जाता है। कला के क्षेत्र में सक्रिय समुदाय की भी इसमें उल्लेखनीय भूमिका रही। 29 मार्च 1954 को पं. जवाहरलाल नेहरू और गणमान्य कलाकारों एवं कला प्रेमियों की उपस्थिति में देश के उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकष्ण ने औपचारिक रूप से एनजीएमए का उदघाटन किया इस उद्देश्य से ल्युटियंस दिल्ली की एक भव्य इमारत, जयपुर हाउस, के चयन ने इस संस्थान की गरिमा एवं महत्व को रेखांकित कर दिया सन् 1936 में जयपुर महाराज के निवास के लिए तैयार इस भवन के वास्तुकार थे सर आर्थर ब्लूमफील्ड। तितली के आकार इस भवन के मध्य में एक गोलाकार सभागार है। इसे केंद्रीय षटकोण की परिकल्पना की शैली में तैयार किया गया जो सर एडविन ल्युटियंस की कल्पना थी। गौरतलब है कि ल्युटियंस ने ही हर्बर्ट बेकर के सहयोग से दिल्ली की नई राजधानी की परिकल्पना की और उसे साकार किया। अन्य देशी रियासतों के भवनों जैसे बीकानेर और हैदराबाद हाउस के साथ जयपुर हाउस भी इंडिया गेट के बाहरी घेरे पर शोभायमान है। जयपुर हाउस के सुप्रसिद्ध वास्तुकार ने इस भवन के विभिन्न झरोखों के बीच जो समरसता दी है, जो तालमेल कायम किया है उससे इस इमारत को एक खास पहचान मिली है।

एनजीएमए के उदघाटन के उपलक्ष्य में मूर्तिकला की एक प्रदर्शनी आयोजित की गई। इसमें उस समय के सभी जाने-माने मूर्तीकारों जैसे देवी प्रसाद रॉय  चौधरी, रामकिंकर बैज, शंखों चौधरी, धनराज भगत, सरबरी राय चौधरी और अन्य की भागीदारी देखी गई। प्रदर्शनी की भव्यता मं एनजीएमए के प्रथम क्यूरेटर हर्मन गेट्ज, जो इस आयोजन में दिन-रात लगे थे, के प्रयास झलक रहे थे। जाने-माने जाने-माने जर्मन कला इतिहासकार गेटज को बड़ौदा संग्रहालय के संगठन का श्रेय भी जाता है। गेट्ज के कार्यकाल से आरंभ एनजीएमए में एक के बाद एक विशिष्ट निदेशकों की परंपरा रही है।

यह गैलरी अपनी श्रेणी में भारत का एक प्रमुख संस्थान है। यह भारत सरकार के संस्कृति विभाग के एक अधीनस्थ कार्यलय की तरह कार्यरत है। एनजीएमए की दो शाखाएं है। एक मुंबई में है और दूसरी  बंगलुरु में। गैलरी देश की सांस्कृतिक दर्शन का संग्रहालय है और यह 1857 से लेकर लगभग पिछले डेढ सौ सालों में दृश्य एवं प्लास्टिक कलाओं के बदलते स्वरूपों को खबूबी प्रदर्शित करता है। कुछ भूली-बिसरी और हल्की-फुल्की कलात्मक वस्तुओं को छोड़कर एनजीएमए के संग्रह को आज यकीनन और निर्विवाद आधुनिक एवं समकालीन कला का देश का सबसे महत्वपूर्ण संग्रह कहा जा सकता है।
 

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